गुरु हरगोबिन्द जी

गुरु हरगोबिन्द जी

 

महत्वपूर्ण जानकारी

 

=> गुरु हरगोबिन्द जी सिख धर्म के छठे सिख गुरु थे।

=> गुरु हरगोबिन्द जी का जन्म 19 जून, 1595 को “गाँव गुरु की वडाली, छेहरटा, जिला अमृतसर” में हुआ था। यह गाँव अमृतसर शहर से 9 कि.मी. दूर है।

गाँव गुरु की वडाली, छेहरटा, जिला अमृतसर
गुरुद्वारा जन्म स्थान पातशाही छेवीं, गुरु की वडाली, अमृतसर

=> गुरु हरगोबिन्द जी के पिता का नाम “गुरु अर्जुन देव जी” और माता का नाम “माता गंगा जी” था।

=> गुरु जी का परिवार “सोढ़ी खत्री” था।

=> गुरु हरगोबिन्द जी बचपन में चेचक की बीमारी से बहुत बीमार हो गए थे। जिससे उनकी जान मुश्किल से ही बच पाई थी। जिसका वर्णन गुरु ग्रन्थ साहिब में अंग 620 पर किया गया है।

मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ।।

धारि क्रिपा प्रभ हाथ दे राखिआ हरि गोविदु नवा निरोआ ।।

तापु गइआ प्रभि आपि मिटाइआ जन की लाज रखाई ।।

साधसंगति ते सभ फल पाए सतिगुर कै बलि जाई ।।

हलतु पलतु प्रभ दोवै सवारे हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ।।

अटल बचनु नानक गुर तेरा सफल करु मसतकि धारिआ ।।

( अंग 620 )

=> पृथ्वी चंद और उसकी पत्नी कर्मों ने तीन बार बालक हरगोबिन्द को मारने की कोशिश की। पहली बारे पृथ्वी चंद ने एक सपेरे को खेल दिखाने के बहाने बालक हरगोबिन्द के पास कोबरा साँप छुड़वाया लेकिन हरगोबिन्द जी बच गए। दूसरी बार कर्मों ने अपनी निजी नर्स से बालक हरगोबिन्द की दूध पिने की निप्पल के चारों और जहर लगवा दिया। लेकिन बालक हरगोबिन्द जी ने दूध पिने से इनकार कर दिया।

तीसरी बार पृथ्वी चंद और उसकी पत्नी कर्मों के कहने पर एक ब्राह्मण ने बालक हरगोबिन्द को दही में जहर डाल कर खिलाना चाहा लेकिन दही से भरा हुआ कटोरा फर्श पर गिर गया। गिरी हुई दही को एक पालतू कुत्ते ने खा लिया और तुरंत मर गया। और ब्राह्मण द्वारा अपने हाथ की उँगलियों को अपने होठों पर लगाने से ब्राह्मण के पेट में जहर के असर से बीमारी हो गई जिससे ब्राह्मण की मौत हो गयी। जिसका वर्णन गुरु ग्रन्थ साहिब में अंग 1137 पर किया गया है।

लेपु न लागो तिल का मूली ।। दुसटु ब्राहमणु मूआ होइ कै सूल ।।

हरि जन राखे पारब्रहमि आपि ।। पापी मूआ गुर परतापि ।।

अपणा खसमु जनि आपि धिआइआ ।। इआणा पापी ओहु आपि पचाइआ ।।

प्रभ मात पिता अपणे दास का रखवाला ।।निंदक का माथा ईहां ऊहा काला ।।

जन नानक की परमेसरि सुणी अरदासि ।। मलेछु पापी पचिआ भइआ निरासु ।।

( अंग 1137 )

=> सितम्बर, 1604 में गुरु हरगोबिन्द जी का पहला विवाह सुल्तानपुर लोधी से 6 कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित गाँव दल्ला की माता भागवती/भागभूरी और भाई नारायण दास जी जुल्का खत्री की पुत्री “दामोदरी जी” से हुआ। लेकिन विवाह जिला मोगा के “गाँव डरोली भाई” में हुआ था। यहाँ पर अब “गुरुद्वारा श्री अंगीठा साहिब माता दामोदरी जी” बना हुआ है। भाई नारायण दास जी गुरु अंगद देव जी के प्रिय शिष्य “भाई पारो जी परमहंस” के वंशज थे।

=> 25 मई, 1606 को गुरु अर्जुन देव जी ने अपनी शहादत से पाँच दिन पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द जी को गुरुगद्दी प्रदान की। लेकिन गुरु हरगोबिन्द जी का उत्तराधिकार समारोह 24 जून, 1606 को हुआ। गुरु जी ने गुरुगद्दी पर बैठते ही राजसी शैली अपना ली और अपने शरीर पर “मीरी और पीरी” नामक दो तलवारें धारण की। मीरी सांसारिक शक्ति और शासन का प्रतीक थी और पीरी आध्यात्मिक शक्ति और धर्म का प्रतीक थी। खंडा ( सिख चिन्ह ) में मीरी और पीरी की दो तलवारें एक साथ बंधी हुई दिखाई देती है। गुरु हरगोबिन्द जी ने मीरी और पीरी व्यवस्था की स्थापना की।

=> गुरु हरगोबिन्द जी ने भाई गुरदास जी से धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया। और बाबा बूढ़ा जी से गुरु जी ने तीरंदाजी व तलवारबाजी की शिक्षा ली।

=> 1606 में गुरु हरगोबिन्द जी ने हरि मन्दिर (स्वर्ण मन्दिर) के सामने 12 फुट ऊँचा “तख़्त श्री अकाल बुंगा” का निर्माण करवाया। जिसे अब “अकाल तख़्त” के नाम से जाना जाता है। और अकाल सेना की स्थापना की।

श्री अकाल तख़्त साहिब, अमृतसर
श्री अकाल तख़्त साहिब, अमृतसर

=> गुरु हरगोबिन्द जी के समय अकाल तख्त पर प्रस्तुति देने वाले दो प्रमुख ढाडी (गायक) मीर अब्दुल्ला और नथा थे।

=> अन्याय और अत्याचार के खिलाफ युद्धों में भाग लेने वाले और अस्त्र-शस्त्र का भण्डार करवाने वाले पहले सिख गुरु थे।

=> गुरु हरगोबिन्द जी ने सिख मार्शल आर्ट ( गतका ) का आविष्कार किया।

=> 1609 में गुरु हरगोबिन्द जी ने रामदासपुर (अमृतसर) की रक्षा के लिए लोहगढ़ किला बनवाया। लोहगढ़ किले ने 1629 में अमृतसर की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमृतसर में वहाँ पर अब “गुरुद्वारा किला श्री लोहगढ़ साहिब” बना हुआ है।

=> 1610 में गुरु हरगोबिन्द जी का दूसरा विवाह पाकिस्तान के जिला शेखुपुरा के गाँव मंडियाली के दयाराम जी मरवाहा खत्री व माता भगन जी की पुत्री “माता महादेवी जी” से हुआ। जिसे माता मरवाही जी के नाम से भी जाना जाता है। गाँव मंडियाली लाहौर-सरगोधा रोड पर लाहौर और शेखुपुरा के बीच स्थित है।

=> अप्रैल, 1613 में गुरु हरगोबिन्द जी का तीसरा विवाह गाँव बकाला ( बाबा बकाला ), जिला अमृतसर के भाई हरि चंद खत्री व माता हरदेई की पुत्री “माता नानकी” से हुआ।

=> 15 नवंबर 1613 को गुरु हरगोबिन्द जी की पहली पत्नी माता दामोदरी जी ने गाँव डरोली भाई, जिला मोगा में बाबा गुरदित्ता जी को जन्म दिया। वहाँ पर अब “गुरुद्वारा जन्म स्थान बाबा गुरदित्ता साहिब जी” बना हुआ है। आगे चलकर बाबा गुरदित्ता 1629 में श्री चंद द्वारा चलाये गए “उदासी सम्प्रदाय” के दूसरे प्रमुख बने।

=> 11 जुलाई 1615 को गुरु हरगोबिन्द जी की पहली पत्नी माता दामोदरी जी ने गुरु का महल, अमृतसर में बीबी वीरो जी को जन्म दिया।

=> 9 जून 1617 को गुरु का महल, अमृतसर में गुरु हरगोबिन्द जी की दूसरी पत्नी माता महा देवी जी ( मरवाही ) ने बाबा सूरज मल जी को जन्म दिया।

=> 14 नवंबर 1618 को गुरु हरगोबिन्द जी की पहली पत्नी माता दामोदरी जी ने गुरु का महल, अमृतसर में बाबा अणि राय जी को जन्म दिया।

=> 31 मई 1619 को गुरु हरगोबिन्द जी की तीसरी पत्नी माता नानकी जी ने गुरु का महल, अमृतसर में बाबा अटल राय जी को जन्म दिया।

=> गुरु हरगोबिन्द जी को सम्राट जहाँगीर ने ग्वालियर के किले में क्यों कैद किया ? इसपर भी विद्वानों में एक मत नहीं है। कुछ का कहना है की गुरु जी की नई नीतियों जैसे लोहगढ़ किले का निर्माण, अकाल तख़्त का निर्माण, अकाल सेना बनाना व सैन्य तैयारियाँ आदि की जानकारी जहाँगीर को विरोधियों द्वारा देना। कुछ विद्वानों अनुसार के जहाँगीर का बीमार होना और विरोधियों द्वारा बीमारी को ठीक करने के लिए गुरु हरगोबिन्द जी का ग्वालियर के किले में 21 दिन प्रार्थना करने का जहाँगीर को कहना।

=> गुरु हरगोबिन्द जी ग्वालियर की जेल में कब से कब तक कैद रहे, इस पर विद्वानों में एक मत नहीं है। कुछ विद्वानों के अनुसार गुरु जी 1606 से 1610 के बीच जेल में रहे लेकिन SGPC के अनुसार गुरू हरगोबिन्द जी 1609-1612 के बीच लगभग तीन साल तक ग्वालियर के किले में कैद रहे। हालाँकि समकालीन फ़ारसी लेखक मीर दुल्फिकार अर्देस्तानी द्वारा 1645 से 1658 के बीच में लिखित ग्रन्थ “दबेस्तान-ए-मज़ाहेब” के अनुसार गुरु हरगोबिन्द जी को जहाँगीर ने ग्वालियर के किले में 1617 से 1619 के बीच लगभग दो साल जेल में रखा गया था। फ़ारसी लेखक मीर दुल्फिकार अर्देस्तानी को मोहसिन फ़ानी या मोल्लाह मोबाद के नाम से भी जाना जाता है।

=> साईं मियां मीर, बाबा बूढ़ा जी और भाई गुरदास जी ने वजीर खान को जहाँगीर से गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले की कैद से छुड़ाने के लिए कहा। वजीर खान ने जहाँगीर से गुरु जी को छोड़ने की विनती की। सम्राट जहाँगीर मान गए लेकिन गुरु हरगोबिन्द जी ने अकेले कैद से बाहर आने से मना कर दिया। वह अपने साथ बंद 52 हिन्दू राजाओं को भी छोड़ने का कहने लगे और उनकी वफादारी की गारंटी ली तो जहाँगीर ने कहा की जो भी गुरु हरगोबिन्द जी के पहने हुए वस्त्र (कपड़े) को पकड़ कर बाहर आएगा उसे रिहा कर दिया जायेगा।

=> 52 हिन्दू राजाओं को छुड़ाने के लिए गुरु हरगोबिन्द जी ने 52 किनारों वाला एक विशेष वस्त्र बनवाया था। दीपावली से कुछ दिन पहले गुरु जी ने 52 हिन्दू राजाओं को छुड़ाया था। 52 हिन्दू राजाओं ने गुरु हरगोबिन्द जी को “बन्दी छोड़ बाबा” की उपाधि दी। ग्वालियर के क़िले में यहाँ गुरु जी 52 हिन्दू राजाओं के साथ बंद थे, वहाँ पर “गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़” बना हुआ है। ग्वालियर की कैद से रिहा होने के बाद जिस दिन गुरु जी अमृतसर पहुंचे उस दिन दीपावली थी। इसीलिए सिख हमेशा दीपावली वाले दिन ही “बन्दी छोड़ दिवस” मनाते है।

गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़, ग्वालियर
गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़, ग्वालियर

=> 1619 में ग्वालियर के किले से रिहा होने के बाद गुरु हरगोबिन्द जी दिल्ली पहुँचे और जहाँगीर से मिले। जहाँगीर को जब गुरु जी से पता चला कि गुरु अर्जुन देव जी की हत्या में सबसे बड़ा हाथ चन्दू शाह का था, तो वह बहुत हैरान हुए। जहाँगीर ने चंदू शाह को गिरफ़्तार करके गुरु जी के हवाले कर दिया।

गुरु हरगोबिन्द जी चन्दू शाह को पकड़ कर तरनतारण होते हुए अमृतसर और फिर लाहौर लेकर गए। लाहौर में गुरु जी ने चंदू शाह को सिख संगत के हवाले कर दिया। सिख संगत ने लाहौर की गलियों में चंदू शाह को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा और वही सारी यातनाएँ दी जो उसने गुरु अर्जुन देव जी को दी थी। अंत में जब वह मर गया तो उसे भी रावी नदी में बहा दिया गया।

=> 1620 में गुरु हरगोबिन्द जी और मुग़ल सम्राट जहाँगीर के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण हो गए और उन्होंने साथ-साथ कश्मीर की यात्रा की।

=> 1 अप्रैल 1621 को गुरु हरगोबिन्द जी की तीसरी पत्नी माता नानकी जी ने गुरु का महल, अमृतसर में “गुरु तेग़ बहादुर जी” को जन्म दिया। जिसका बचपन का नाम “त्याग मल” था।

=> 17 अप्रैल 1621 को गुरु हरगोबिन्द जी के पुत्र बाबा गुरदित्ता जी का विवाह बटाला निवासी भाई राम जी की पुत्री अनन्ति/निहाल कौर से हुआ। इनका पुत्र हर राय जी आगे चलकर सिख धर्म का सातवाँ गुरु बना। वर्तमान में भी बाबा गुरदित्ता जी के वंशज करतारपुर के सोढ़ी के नाम से जाने जाते है।

=> 3 अक्टूबर, 1621 में गुरु हरगोबिन्द जी ने व्यास नदी के किनारे मुग़ल आक्रमणों के कारण खण्डार बन चुके गोबिन्दपुरा (रोहिल्ला) गाँव को फिर से आबाद करने लगे तो स्थानीय सामंत भगवान दास किरार से विवाद हो गया। इस गाँव को गुरु अर्जुन देव जी ने 1587 में बसाया था। भगवान दास किरार और उनके पुत्र रतन चंद ने चंदू शाह के पुत्र करम चंद के साथ मिलकर इसकी शिकायत जालंधर के मुग़ल फौजदार अली बेग (अब्दुल्ला खान) से की। अब्दुल्ला खान और गुरु हरगोबिन्द जी के बीच रोहिल्ला का युद्ध 3 अक्टूबर,1621 को हुआ। जिसे श्री हरगोबिन्दपुर का युद्ध भी कहा जाता है।

इस युद्ध में मुग़ल सेना में 4000 सैनिक थे और सिख सेना में 500 के लगभग सैनिक थे। गुरु हरगोबिन्द जी ने सेना की कमान भाई जट्टू जी को दी जो युद्ध में शहीद हो गए थे। गुरु जी ने भाई बिधि चंद जी के जत्थे को रिजर्व में रखा था ताकि मुश्किल हालत में हमला करने के काम आ सके। इस युद्ध में सिख सेना की जीत हुई और भगवान दास किरार उनका पुत्र रतन चंद, चंदू शाह का पुत्र करम चंद मारे गए। साथ ही अली बेग (अब्दुल्ला खान) और उसके दोनों पुत्र नबी बेग व करीम बेग भी मारे गए।

सिख सेना में से भाई नानू जी, भाई पिराणा जी, भाई जट्टू जी, भाई परम राम जी भाई कल्याण जी भाई सकटू जी और भाई मथुरा भट्ट जी शहीद हुए। भाई मथुरा भट्ट जी के भजन/श्लोक गुरु ग्रन्थ साहिब में दर्ज है।

यहाँ रोहिल्ला या श्री हरगोबिन्दपुर का युद्ध हुआ वहाँ पर अब “गुरुद्वारा दमदमा साहिब” बना हुआ है। गुरु हरगोबिन्द जी ने श्री हरगोबिन्दपुर शहर को फिर से आबाद किया। इस युद्ध का पता जब मुग़ल बादशाह जहाँगीर को चला तो वह बहुत हैरान हुए। उसने बिना आज्ञा के युद्ध करने के कारण अली बेग (अब्दुल्ला खान) के वंशजों की सारी सम्पति पर कब्ज़ा करने का आदेश दिया।

श्री हरगोबिन्दपुर शहर में स्थानीय मुस्लिम आबादी के अनुरोध पर गुरु हरगोबिन्द जी ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया, जो आज भी मौजूद है। इसे अब “गुरु की मसीत (गुरु की मस्जिद)” कहा जाता है। 1947 में पंजाब के विभाजन के समय निहंगों ने गुरु की मसीत पर कब्ज़ा कर लिया और मस्जिद के स्थान पर एक गुरुद्वारा स्थापित किया। गुरु जी ने श्री हरगोबिन्दपुर शहर में हिन्दुओं के लिए एक धर्मशाला का भी निर्माण करवाया।

=> 1627 में बाबा गुरदित्ता जी के माध्यम से गुरु हरगोबिन्द जी ने कहलूर के राजा तारा चंद से जमीन खरीद कर कीरतपुर शहर की स्थापना की। भूमि पूजन का काम बाबा श्री चंद जी ने किया और शहर का निर्माण बाबा गुरदित्ता जी की देखरेख में पूरा हुआ।

गुरुद्वारा बाबा गुरदित्ता जी, कीरतपुर साहिब
गुरुद्वारा बाबा गुरदित्ता जी, कीरतपुर साहिब

=> 1627 में लाहौर के दीवान जसपत राय के साथ गुरु जी का किसी बात को लेकर मनमुटाव हो गया। दीवान के उकसावे में आकर लाहौर के नवाब याह्या ख़ान ने 1599 में डब्बी बाजार में गुरु अर्जुन देव जी द्वारा बनाई गई बावली ( सरोवर ) और लंगर हॉल को ध्वस्त करवा दिया। जिसे फिर से 1834 में महाराजा रणजीत सिंह जी ने बनवाया।

=> 23 जुलाई 1628 को अमृतसर में गुरु हरगोबिन्द जी के पुत्र बाबा अटल राय जी का लगभग 9 साल की उम्र में देहांत हो गया। वहाँ पर अब “गुरुद्वारा बाबा अटल राय साहिब जी” बना हुआ है।

=> 13 जनवरी, 1629 को कीरतपुर में गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र बाबा श्री चंद जी का 134 साल की उम्र में स्वर्गवास हो गया। बाबा श्री चंद जी के देहांत के बाद गुरु हरगोबिन्द जी के सबसे बड़े पुत्र बाबा गुरदित्ता जी उदासी सम्प्रदाय की गद्दी पर बैठे।

=> 23 अप्रैल 1629 को गुरु हरगोबिन्द जी के पुत्र बाबा सूरज मल जी का विवाह करतारपुर (जलंधर) के भाई प्रेम चंद जी की पुत्री माता हरि जी ( खेम कौर ) से हुआ था। वर्तमान में भी बाबा सूरज मल जी के वशंज श्री आनंदपुर के सोढ़ी के नाम से जाने जाते है।

=> 5 जून 1629 को अमृतसर की लड़ाई गुरु हरगोबिन्द जी और मुग़ल साम्राज्य में पंजाब प्रान्त के सूबेदार कलिज खान के जनरल मुखलिस खान (लाहौर के जनरल) के बीच लड़ी गयी। जिसमे मुग़ल सेना 7000 और सिख सेना 700 थी। जिसमें मुखलिस खान ने गुरु हरगोबिन्द जी को द्वन्द युद्ध के लिए ललकारा। द्वन्द युद्ध में गुरु जी ने मुखलिस खान हो तलवार के एक ही बार में मार दिया। और सिख सेना की जीत हुई। युद्ध का मुख्य कारण ईरानी बादशाह द्वारा मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को उपहार में भेजे गए एक दुर्लभ सफ़ेद बाज पर गाँव गुमटाला (अमृतसर) के जंगलों में सिख सेना का कब्ज़ा करना और फिर उसे वापिस नहीं करना था।

=> अमृतसर की लड़ाई में सिख सेना के 13 महान योद्धा शहीद हुए। जिनकी याद में गुरु हरगोबिन्द जी ने अमृतसर-तरनतारन रोड पर अमृतसर 7 कि.मी. दूर “गुरुद्वारा संगराणा साहिब” बनवाया। ये 13 महान योद्धा निम्न थे :- 1. भाई नन्द जी 2. भाई जैता 3. भाई पिराणा जी 4. भाई तोता जी 5. भाई तिरलोका जी 6. भाई साईं दास जी 7. भाई पैड़ा जी 8. भाई भगतू जी 9. भाई नांता जी 10. भाई निहाला जी 11. भाई तख्तू जी 12. भाई मोहन जी 13. भाई गोपाल जी।

गुरुद्वारा संगराणा साहिब, अमृतसर
गुरुद्वारा संगराणा साहिब, अमृतसर

=> 13 जून 1629 को गुरु हरगोबिन्द जी ने अपनी पुत्री बीबी वीरो जी की का विवाह गाँव मल्ला, जिला फ़रीदकोट के भाई धर्मचंद खोसला खत्री के पुत्र साधुराम खोसला से हुई। गाँव मल्ला फ़रीदकोट से 40 कि.मी. दूर और बठिंडा से 35 कि.मी. दूर है। हालाँकि विवाह स्थल गाँव झम्बल जिला तरनतारन में है।यहाँ पर बीबी वीरो जी के आनंद कारज/लांवां  (फेरे) हुए वहाँ पर “गुरुद्वारा बीबी वीरो जी” बना हुआ है। यह गाँव अमृतसर से 20 कि.मी. दूर है।

=> 1629 को गुरु हरगोबिन्द जी के पुत्र बाबा अणि राय जी ने कीरतपुर में आत्महत्या कर ली। कीरतपुर साहिब में उनका समाधि स्थल आज भी मौजूद है।

=> 1630 के आसपास गुरु हरगोबिन्द जी और मराठा संत समर्थ रामदास जी की मुलाकात उत्तराखंड में गढ़वाल पहाड़ियों के पास श्रीनगर में हुई। समर्थ रामदास जी उस समय उत्तर भारत की यात्रा पर थे। और गुरु हरगोबिन्द जी उत्तराखंड के एक कस्बे नानकमत्ता की यात्रा पर थे। इसका उल्लेख “पंजा साखियां” नामक एक सिख पंजाबी पाण्डुलिपि में और 18वीं शताब्दी में “हनुमंत स्वामी” द्वारा मराठी ग्रन्थ “रामदास स्वामीचि बखर” में मिलता है।

समर्थ रामदास जी ने गुरु हरगोबिन्द जी से पूछा मैंने सुना है कि आप नानक की गद्दी पर विराजमान हैं। नानक एक त्यागी साधु थे, एक ऐसे संत जिन्होंने संसार त्याग दिया था। आपके पास शस्त्र हैं और आपके पास एक सेना और घोड़े भी हैं। आप खुद को सच्चा पातशाह , यानी सच्चे राजा कहलाने देते हैं । आप किस तरह के साधु हैं?”

गुरु हरगोबिन्द जी ने समर्थ रामदास जी को उत्तर दिया आंतरिक रूप से एक संन्यासी और बाहरी रूप से एक राजकुमार। शस्त्र का अर्थ है गरीबों की रक्षा और अत्याचारी का विनाश। बाबा गुरु नानक ने संसार का त्याग नहीं किया था, बल्कि माया , स्वयं और अहंकार का त्याग किया था।”

=> 13 जुलाई 1631 को गाँव डरोली भाई, जिला मोगा में गुरु हरगोबिन्द जी की पत्नी माता दामोदरी जी का निधन हुआ। माता दामोदरी जी के वंशज आज भी गाँव डरोली भाई, जिला मोगा में “गुरुद्वारा गुरु का महल अटारी साहिब पातशाही 6वीं” के पास रहते है और वे गुरु हरगोबिन्द जी की कुछ दुर्लभ निजी वस्तुओं के संरक्षक है। और साथ ही उनके पास गुरु ग्रन्थ साहिब की एक हस्तलिखित प्रति भी है जिस पर गुरु गोबिन्द सिंह जी की व्यक्तिगत मोहर लगी हुई है। निजी वस्तुएं व गुरु ग्रन्थ साहिब की प्रति गुरुद्वारा गुरु का महल अटारी साहिब में रखी हुई है।

=> 16 नबंवर 1631 को गाँव रामदास, जिला अमृतसर में गुरु हरगोबिन्द जी की उपस्थिति में बाबा बूढ़ा जी का 125 साल की उम्र में स्वर्गवास हो गया। बाबा बूढ़ा जी के अंतिम संस्कार का सम्पूर्ण क्रियाकर्म गुरु हरगोबिन्द जी ने अपने हाथों से किया। बाबा बूढ़ा जी के पार्थिव शरीर को मुखाअग्नि उनके छोटे बेटे भाई भाना जी ने दी। यहाँ बाबा बूढ़ा जी का अंतिम संस्कार किया गया, वहाँ पर अब “गुरुद्वारा समाध बाबा बूढ़ा जी” बना हुआ है। गाँव रामदास की दूरी डेरा बाबा नानक से 15 कि.मी. है।

=> 14 सितंबर 1632 को करतारपुर (जलंधर) के भाई लाल चंद सुभिक्खी खत्री व माता बिशन देवी की पुत्री “माता गुजरी जी” से गुरु तेग़ बहादुर जी का विवाह हुआ। हालाँकि लाल चंद जी का पैतृक गाँव लखनौर साहिब, अम्बाला (हरियाणा) था।

=> 1634 में गुरु हरगोबिन्द जी मालवा क्षेत्र की यात्रा पर जाते समय अमृतसर से आदि ग्रन्थ ( गुरु ग्रन्थ साहिब ) की मूल बीड़ भी अपने साथ ले गए। लेकिन रास्ते में गाँव डरोली भाई (मोगा) में कुछ दिन रोकने के बाद गुरु जी ने आदि ग्रन्थ ( गुरु ग्रन्थ साहिब ) की मूल बीड़ को अपने परिवार सहित करतारपुर ( जालंधर ) भेज दिया।

=> 16 दिसंबर, 1634 गुरु हरगोबिन्द जी और लाहौर के सूबेदार खलील बेग के सेनापति कमर बेग और लाला बेग के बीच “गुरुसर की लड़ाई” हुई। इस लड़ाई का मुख्य कारण लाहौर के गवर्नर खलील बेग द्वारा गुरु जी के अनुयायी से दो घोड़े छीनना था।

भाई साध जी जिसे सदा जी/ साधु जी या फिर करोड़ी मल्ल जी के नाम से भी जाना जाता है, को गुरु हरगोबिन्द जी ने मध्य एशिया से घोड़े लाने का काम सौंपा। भाई साध जी ने पहले बल्ख, अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा की। फिर इराक से तीन घोड़े ख़रीदे और उन्हें लेकर भाई साध जी अमृतसर आ रहे थे लेकिन उन तीन में से एक घोडा रास्ते में ही मर गया और दो घोड़े जिनका नाम भाई साध जी ने दिलबाग और गुलबाग रखा था।

लाहौर पहुँचने पर दोनों घोड़ों को लाहौर के सूबेदार खलील बेग़ ने भाई साध जी से छीन लिए। जब यह बात भाई साध जी ने गुरु हरगोबिन्द जी को बताई तो उन्होंने घोड़ों को वापिस लाने का काम भाई बिधि चंद जी को सौंपा। भाई बिधि चंद जी ने एक घोड़े को तो लाहौर के अस्तबल में घास चराने वाला बनकर आधी रात को घोड़े सहित रावी नदी में छलाँग लगाकर लेकर आया और दूसरे घोड़े को ज्योतिषी बनकर रावी नदी में घोड़े सहित छलाँग लगाकर लेकर आये।

घोड़े ले आने से गुरु हरगोबिंद जी ने हमले की आशंका जताई व उन्होंने फिरोजपुर और बठिंडा के बीच स्थित “लखी जंगल” में शरण ली। लाहौर के गवर्नर अनायत उल ख़ान (ख़लील बेग) ने कमर बेग और लाल बेग के नेतृत्व में 22000 की एक विशाल सेना गुरु जी के पीछे भेजी। गुरु जी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी कर रखी थी। गुरु जी की सेना में लगभग 4000 सैनिक थे जिसमें राय जोध शाह के 500, भक्त सलीम शाह के 500, काँगड़ा सैनिक 1000, मालवा के भक्त सैनिक लगभग 500 जिसमें बराड़ गोत्र के जाटों का महत्वपूर्ण योगदान था। बाक़ी के लगभग 1500 सैनिक जो गुरु हरगोबिंद जी अकाल सेना या संत योद्धा थे।

यह लड़ाई 16 दिसंबर, 1634 में बठिंडा के मेहराज और लहरा गाँव के बीच में स्थित गुरुसर नामक स्थान पर हुई, इसीलिए इसे गुरुसर की लड़ाई या मेहराज की लड़ाई या लहरा की लड़ाई के नाम से भी जाना जाता है। इस लड़ाई में गुरु हरगोबिंद जी की जीत हुई और मुगल सेना की हार। गुरु जी की सेना से भाई कीर्त भट्ट जी, भाई जेठा जी आदि सहित लगभग 1200 संत सैनिकों की शहादत हुई। मुगल सेना में लाल बेग, कमर बेग, समस बेग, क़सम बेग और काबुल बेग जैसे सेनापति अपनी सेना सहित मारे गए।यहाँ लड़ाई हुई वहाँ पर अब गुरुद्वारा गुरुसर साहिब व एक जलकुण्ड बना हुआ है।

गुरुद्वारा गुरुसर साहिब, मेहराज, बठिंडा
गुरुद्वारा गुरुसर साहिब, मेहराज, बठिंडा

=> 26 अप्रैल, 1635 को गुरु हरगोबिन्द जी की अकाल सेना और जालंधर के मुग़ल गवर्नर काले ख़ान की मुग़ल सेना के बीच करतारपुर (जालंधर) में लड़ाई हुई। इस लड़ाई का मुख्य कारण गुरु जी के पूर्व सेनापति पेंदे ख़ान का गुरु जी से छोटी सी बात को लेकर मनमुटाव होना और पेंदे ख़ान का दलबदल कर जालंधर के मुग़ल गवर्नर काले ख़ान के साथ शामिल होना था। काले ख़ान पहले ही अपने भाई मुख़लिस ख़ान की मौत का बदला लेना चाहता था जो की गुरु जी के हाथों अमृतसर की लड़ाई में मारा गया था।

करतारपुर (जालंधर) की लड़ाई में गुरु हरगोबिन्द जी की सेना में गुरुजी के अलावा त्याग मल ( तेग़ बहादुर जी ), बिधि चन्द जी, बाबा गुरदित्ता जी, भाई जाति मलिक जी, भाई लक्खी दास जी, भाई मेहर चन्द जी, भाई फतेह चंद जी भट्ट और भाई अमीर चन्द जी भट्ट ( धर्म भट्ट जी के पुत्र और भोज भट्ट जी पोते ) दूसरी तरफ़ मुग़ल सेना में जालंधर के गवर्नर काले ख़ान, पेंदे ख़ान, क़ुतुब ख़ान, अनवर ख़ान, अजमत ख़ान और खोजा अनवर।

गुरु जी की सेना में लगभग 5000 संत सैनिक थे और काले ख़ान की मुग़ल सेना में कितने सैनिक थे इसके बारे इतिहासकार एक मत नहीं हे लेकिन माना जाता हे की लगभग 15000 से 20000 के बीच में मुग़ल सैनिक थे। करतारपुर (जालंधर) की लड़ाई में गुरु हरगोबिन्द जी की अकाल सेना ने काले ख़ान और उनके अन्य सेनापतियों सहित मुग़ल सैनिकों मार गिराया बचे हुए सैनिक भाग गए। गुरु हरगोबिन्द जी ने पेंदे ख़ान को द्वन्द युद्ध में मौत के घाट उतार दिया। इस लड़ाई में भट्ट फतेह चंद और भट्ट अमीर चन्द के साथ-साथ कई संत सैनिक भी शहीद हो गए और इस लड़ाई को गुरु जी की अकाल सेना ने जीत लिया।

इस लड़ाई में गुरु हरगोबिन्द जी के 14 साल के सबसे छोटे पुत्र त्याग मल जी ने अपनी तलवारबाजी और असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया। जिसे देख कर गुरु जी ने अपने पुत्र का नाम त्याग मल से बदल कर तेग़ बहादुर ( तलवार का वीर ) रख दिया। जो आगे चलकर सिख धर्म के नौवें सिख गुरु बने।

=> लाहौर से 20 कि.मी. दूर बरकी रोड पर गाँव हुदिआरा में स्थित प्राचीन सिख गुरुद्वारे में करतारपुर की लड़ाई (1635) को दर्शाने वाला भित्तिचित्र जर्जर हालत में आज भी मौजूद है। जिसमें गुरु हरगोबिन्द जी पेंदे ख़ान को दो भागों में काटते हुए दिखाया गया है।

हुदिआरा (लाहौर) में स्थित प्राचीन सिख गुरुद्वारे में करतारपुर की लड़ाई (1635) को दर्शाने वाला भित्तिचित्र
हुदिआरा (लाहौर) में स्थित प्राचीन सिख गुरुद्वारे में करतारपुर की लड़ाई (1635) को दर्शाने वाला भित्तिचित्र

=> करतारपुर (जालंधर) की लड़ाई के तीन दिन बाद 29 अप्रैल,1635 को जब गुरु हरगोबिन्द जी किरतपुर साहिब जा रहे थे, तो फागवारा के पास गाँव पलाही में अहमद ख़ान के नेतृत्व में मुग़ल सेना ने अचानक हमला बोल दिया। जिसमें गुरु जी की सेना को काफ़ी नुक़सान का सामना करना पड़ा। इस हमले में भाई दासा जी और सोहेला जी (बल्लू भट्ट के पुत्र और मूला भट्ट के पोते) ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।

=> 1635 में करतारपुर की लड़ाई के बाद कीरतपुर जाते समय गुरु हरगोबिन्द जी करतारपुर से आदि ग्रंथ (गुरु ग्रंथ साहिब जी) साथ ले जाना भूल गए। जिस पर बाबा गुरदित्ता जी के बड़े पुत्र या गुरु हरगोबिन्द जी के पोते धीरमल ने कब्जा कर लिया और गुरु जी को देने से मना कर दिया।

लगभग 30 साल बाद नौवें गुरु तेग़ बहादुर जी के अनुयायीओं ने इसे जबरन वापिस पा लिया। लेकिन गुरु तेग़ बहादुर जी ने उन्हें आदि ग्रंथ वापिस करने का निर्देश दिया। आदि ग्रंथ का स्वामित्व अंततः 19वीं शताब्दी के शुरुआत में महाराजा रणजीत सिंह के पास चला गया। जिन्होंने इसे लाहौर क़िले में अपने निजी गुरुद्वारे में रखा। सिख साम्राज्य के पतन और उसके ब्रिटिश साम्राज्य में विलय के साथ आदि ग्रंथ अंग्रेजों के क़ब्ज़े में आ गया। अंग्रेजों ने 1850 में धीरमल के वंशज करतारपुर के सोढ़ी साधु सिंह सोढ़ी की याचिका पर आदि ग्रंथ उसे दे दिया गया। तब से आदि ग्रंथ उस सोढ़ी परिवार के वंशजों के पास आज भी मौजूद है।

=> गुरु हरगोबिन्द जी ने अपने जीवन के आख़िरी नौ-दस साल कीरतपुर में ही रह कर नानकपंथी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया। और कीरतपुर (पंजाब) को एक नया आध्यात्मिक केंद्र बनाया। गुरु हरगोबिन्द जी ने कीरतपुर साहिब में जाकर जिस जगह को अपना निवास स्थान बनाया, वहाँ अब “गुरुद्वारा हरिमंदर साहिब” बना हुआ है। और यहाँ पर ही एक बाग भी लगवाया जिसे “नौ लखा बाग” के नाम से जाना जाता है।

=> 15 मार्च 1638 को गुरु हरगोबिन्द जी के सबसे बड़े पुत्र बाबा गुरदित्ता जी का कीरतपुर (पंजाब) में निधन हो गया। वहाँ पर अब “गुरुद्वारा बाबा गुरदित्ता जी” बना हुआ है।

=> 1644 के शुरुआत में गुरु हरगोबिन्द जी की दूसरी पत्नी माता महा देवी जी ( मरवाही जी ) का देहांत कीरतपुर में हो गया। और कुछ दिनों के बाद उनके पुत्र बाबा सूरज मल जी का भी देहांत हो गया। गुरु हरगोबिन्द जी के जीवनकाल में ही पाँच पुत्रों में से चार पुत्र परलोक सिधार गए।

=> ताउस वाद्ययंत्र का आविष्कार भी गुरु हरगोबिन्द जी ने किया था।

=> गुरु हरगोबिन्द जी पहले सिख गुरु थे जिन्होंने जंगलों में जानवरों का शिकार करना शुरू किया।

=> 3 मार्च, 1644 को गुरु हरगोबिन्द जी ने अपने पोते और बाबा गुरदित्ता जी के छोटे बेटे हर राय जी को सातवाँ सिख गुरु या सप्तम नानक बनाया।

=> 3 मार्च, 1644 को कीरतपुर साहिब, जिला रूपनगर (पंजाब) में गुरु हरगोबिन्द जी का स्वर्गवास हो गया। कीरतपुर में यहाँ पर उनका स्वर्गवास हुआ वहाँ पर गुरुद्वारा पातालपुरी साहिब बना हुआ है।

गुरुद्वारा पातालपुरी साहिब, कीरतपुर (पंजाब)
गुरुद्वारा पातालपुरी साहिब, कीरतपुर (पंजाब)

 

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